कबीर और तुलसीदास के काव्य में दार्शनिक दृष्टिकोण का तुलनात्मक अध्ययन

  • सुषमा काशिव सहायक प्राध्यापक, हरदा डिग्री कॉलेज, हरदा (म.प्र.)

Abstract

सारांश : कबीर और तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के दो प्रमुख संत-कवि हैं, जिनके काव्य में गहन दार्शनिक चिंतन निहित है। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य इन दोनों कवियों के काव्य में विद्यमान दार्शनिक दृष्टिकोण का तुलनात्मक विश्लेषण करना है। कबीर निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रतिनिधि हैं, जो ईश्वर को निराकार, सर्वव्यापी और अनुभवगम्य मानते हैं। उनके काव्य में ज्ञान, आत्मबोध, गुरु की महत्ता तथा सामाजिक समानता पर विशेष बल दिया गया है, साथ ही उन्होंने जाति-पाति, अंधविश्वास और धार्मिक आडंबरों का तीव्र विरोध किया है। इसके विपरीत तुलसीदास सगुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि हैं, जिन्होंने भगवान राम के साकार स्वरूप के माध्यम से भक्ति, धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठित किया। उनके अनुसार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति संभव है। इस अध्ययन में दोनों कवियों के ईश्वर संबंधी विचार, भक्ति का स्वरूप, मोक्ष के साधन तथा सामाजिक दृष्टिकोण का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। निष्कर्षतः यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि दोनों के दृष्टिकोण में मूलभूत भिन्नताएँ हैं—जैसे निर्गुण एवं सगुण भक्ति—फिर भी उनका अंतिम उद्देश्य मानवता का कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति है। इस प्रकार, दोनों कवियों का काव्य भारतीय दर्शन की समन्वयात्मक और बहुआयामी परंपरा को समृद्ध करता है। कुंजी शब्द : भक्ति काल, निर्गुण भक्ति, सगुण भक्ति, दार्शनिक दृष्टिकोण, कबीर, तुलसीदास, रामभक्ति, आत्मबोध, सामाजिक सुधार, मोक्ष ।
How to Cite
सुषमा काशिव. (1). कबीर और तुलसीदास के काव्य में दार्शनिक दृष्टिकोण का तुलनात्मक अध्ययन. ACCENT JOURNAL OF ECONOMICS ECOLOGY & ENGINEERING ISSN: 2456-1037 SIF:8.20, Peer Reviewed and Refereed Journal, UGC APPROVED NO. 48767 (Ref.2018), 11(04), 36-40. Retrieved from https://ajeee.co.in/index.php/ajeee/article/view/6073
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