परम्परागत भारतीय विरासत में सुरक्षा की सुनिष्चितता

  • डॉ0 अजय कुमार पाण्डेय

Abstract

सौन्दर्यता, सहजता, कोमलता, मानव मन को आकर्षित, नैन-नक्श,चेहरे की मुस्कान, नाज-नक्श(नखरे), भावकुता की स्त्री अंलकारिता मे उद्वेलित एंव भाव विभोर की नैर्ष्गिक चुभन की स्वभाविकता मे जीवन की उद्विग्नता नीहित है। इस सैद्वान्तिक विश्वास के धरातल पर अविश्वास मंे गुणात्मक वृद्वि हुई हैं आत्मबोध की अमूल्य निधि में भ्रमात्मक शक्ति का दबाव बढ जाता है जिससे तृष्णा की शान्ति एंव स्वार्थ की पूरिता मे सम्बन्धो के मजबूत धागे समकालीन परिदृश्य मे कच्चे-कमजोर हो गये है। पति-पत्नी,अन्य सदस्य सगे-सम्बन्धी इत्यादि के मध्य सम्बन्ध के अवमूल्यन ने विचारणीय यक्ष प्रश्न के साथ दीर्घकालीन सुव्यवस्थात्मक सनातनवलम्बी परम्परा को धरासायी किया है। यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता की परिवर्तनीयता में यत्र नार्यस्तु चक्रमणे रमेन्ते तत्र द्रव्यते वा पुरूषःकुटते मृतः छिदयन्ते प्रासंगिक है। संस्कार, सभ्यता, समरसता की मिठास मे दादी-पोते, सास-दामाद, भाई-बहन,बाप-बेटी,चाचा- भतीजी, मामा-भांजी इत्यादि पाणिग्रहण मंे परिवर्तन होना दिनचर्या की सूचना के साथ गैरसनातन व्यवस्था को पीछे छोडकर आगे निकल जा चुका है। इसी महत्ता एंव विशेषता के कारण सनातन को सर्वश्रेष्ठ अन्य धर्म/मजहब को भ्रष्ट रूप मे व्यापक पैमाने, वैश्विक स्तर पर प्रसारित किया जा रहा है।
How to Cite
डॉ0 अजय कुमार पाण्डेय. (1). परम्परागत भारतीय विरासत में सुरक्षा की सुनिष्चितता. ACCENT JOURNAL OF ECONOMICS ECOLOGY & ENGINEERING ISSN: 2456-1037 SIF:8.20, Peer Reviewed and Refereed Journal, UGC APPROVED NO. 48767 (Ref.2018), 10(1), 184-190. Retrieved from https://ajeee.co.in/index.php/ajeee/article/view/5479
Section
Articles