मोटे अनाज व आहार संबंधी मार्ग-निर्देशिका : एक सुझाव

  • डॉ. अंजु सोनकर

Abstract

भारत में अक्सर कृषि के लिए गेहूं, मक्का और चावल जैसी बड़े दाने वाली फसलों के महत्व को भली भांति समझा जाता है, जबकि छोटे बीज वाली फसलों के एक छोटे समूह जिसे मिलेट्स या मोटा अनाज के नाम से भी जाना जाता है, के महत्व को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। जब मोटे अनाज की फसलों को प्रारंभिक खेती में शामिल किया जाता है तो उन्हें आम तौर पर छोटी फसलों के रूप में देखा जाता है जो कृषि में निम्न भूमिका निभाते हैं। यध्यपि मोटे अनाज की फसलों को पूरे विश्व में पुरातात्विक खोज अभियानों में अक्सर देखा गया है, फिर भी वे ना तो कभी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं और न ही प्राथमिक खाध्य स्रोत की तरह इस्तेमाल होते हैं। मिलेट्स या मोटा अनाज फसलों का एक समूह है जो, मुख्यतः उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में खेती के लिए अनुकूल होते हैं तथा सीमित स्रोतों के साथ उगाए जा सकते हैं। ये फसलें जलवायु के अनुकूल, कठोर और शुष्क भूमि वाली फसलें हैं जो खाद्य और पोषण सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। आम तौर पर, ये वर्षा आधारित फसलें हैं जो कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाई जाती हैं और सतत कृषि और खाद्य सुरक्षा में बहुत अधिक महत्व रखती हैं। इन फसलों में मुख्यतः ज्वार, बाजरा, रागी/मँड़ुआ/कोदा, सावन/झंगोरा, कँगनी/ककुम/ कौणी, चीणा आदि शामिल हैं।
How to Cite
डॉ. अंजु सोनकर. (1). मोटे अनाज व आहार संबंधी मार्ग-निर्देशिका : एक सुझाव . ACCENT JOURNAL OF ECONOMICS ECOLOGY & ENGINEERING ISSN: 2456-1037 SIF:8.20, Peer Reviewed and Refereed Journal, UGC APPROVED NO. 48767 (Ref.2018), 10(1), 128-134. Retrieved from https://ajeee.co.in/index.php/ajeee/article/view/5094
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