‘‘ऋग्वेदीय स्वस्तिभावः स्वास्थ्य सुख के परिप्रेक्ष्य में‘‘
Abstract
ऋग्वैदिक काल में स्वास्थ्य सुख अर्थात तन-मन की कुशलता को अभिव्यक्त करने वाला शब्द ‘स्वस्ति‘ ही है। निरोगता, स्वास्थ्य अथवा स्वस्थ-जैसे शब्दों का प्रयोग प्रायः ऋग्वेद में प्राप्त नहीं होता है। वैदिक ऋषियों की प्रार्थनाओं में धन, सम्पत्ति वीर पुत्रों, पशुधन - गौ, अश्वादि - प्राप्ति की कामनाएँ तो हैं ही ‘स्वस्ति‘ के लिए भी प्रार्थनाएँ की गयी हैं। वस्तुतः स्वस्ति भाव भारतीय संस्कृति का श्रेष्ठतम सूत्र है।
How to Cite
डॉ0 भैरवी. (1). ‘‘ऋग्वेदीय स्वस्तिभावः स्वास्थ्य सुख के परिप्रेक्ष्य में‘‘. ACCENT JOURNAL OF ECONOMICS ECOLOGY & ENGINEERING ISSN: 2456-1037 SIF:8.20, Peer Reviewed and Refereed Journal, UGC APPROVED NO. 48767 (Ref.2018), 9(12), 122-128. Retrieved from https://ajeee.co.in/index.php/ajeee/article/view/5043
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