विवादों का तुरंत न्यायिक समाधान की अवधारणा में लोक अदालतों की भूमिका एवं योगदान

  • डाॅ. सुख देव रेबारी

Abstract

शोध सारांश: न्यायालय में बढ़ते बोझ को कम करने तथा विवादों का तुरन्त न्यायिक समाधान की अवधारणा में लोक अदालत के माध्यम से निपटाये जाने का विकल्प के रूप में उभर कर आया, लोक अदालत के माध्यम से पक्षकारों के मामलों के विवादों का त्वरित एवं सस्ता, सरल न्याय प्रदान करता है। पक्षकारों के बीच विवादों सदैव के लिये आपसी समझौता द्वारा निपटारा कर देता है। जिससे पक्षकारों में सौहार्द्रपूर्वक वातावरण को बढ़ाता है। लोक अदालत त्वरित व तुरन्त न्याय के साथ-साथ न्यायालय में बढ़ते बोझ को कम करने में सहभागिता भी निभाता है। विवादों के तुरन्त न्यायिक समाधान में विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के विधिक प्रावधानों के तहत् पक्षकारों के विवादों का आपसी समझाइश द्वारा नियमित लोक अदालतों, जन-उपयोगी सेवाओं का तुरन्त निस्तारक के लिये स्थाई लोक अदालत के माध्यम से न्यायिक समाधान की अवधारणा में त्वरित व सस्ता, सरल न्याय प्रदान करने में योगदान करता है। लोक अदालत को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत् वैधानिक दर्जा प्रदान किया गया, लोक अदालत के निर्णय सिविल न्यायालय के निर्णय माना जाता है तथा समझौते पर आधारित होने के कारण कोई अपील नहीं होती है। इस प्रकार विवादों का अन्तिम निर्णय हो जाता है। लोक अदालत के माध्यम से लाखों मामलों त्वरित निपटाया किया गया है। शब्द कुंजी: विधिक सेवा, न्यायालय, लोक अदालते, न्याय, विवाद।
How to Cite
डाॅ. सुख देव रेबारी. (1). विवादों का तुरंत न्यायिक समाधान की अवधारणा में लोक अदालतों की भूमिका एवं योगदान. ACCENT JOURNAL OF ECONOMICS ECOLOGY & ENGINEERING ISSN: 2456-1037 INTERNATIONAL JOURNAL IF:7.98, ELJIF: 6.194(10/2018), Peer Reviewed and Refereed Journal, UGC APPROVED NO. 48767, 5(12), 1-3. Retrieved from https://ajeee.co.in/index.php/ajeee/article/view/1516