ईशावास्योपनिषद में सामाजिक चेतना

  • डाॅ. राजनाथ यादव

Abstract

वेद विश्व का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ रत्न है। इसके चार भाग हैं- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्। वेद का अन्तिम भाग होने के कारण उपनिषद् को ‘वेदान्त’ भी कहते हैं। उपनिषद् उप और नि उपसर्ग पूर्वक ‘सद्’ धातु से ‘क्विप्’ प्रत्यय करने पर बना है जिसका अर्थ है ज्ञान-प्राप्ति के लिए निष्ठापूर्वक गुरु के समीप बैठना। उपनिषद् मुख्यतया ब्रह्मविद्या का द्योतक है, क्योंकि इस विद्या के अनुषीलन से मुमुक्ष जनों की संसार-बीजभूता अविद्या नष्ट हो जाती है, ब्रह्म की प्राप्ति होती है और मनुष्य के दुःख या बन्धन षिथिल हो जाते हैं।1 आचार्यों की अपरोक्ष अनुभूति से प्रमाणित ज्ञान जब साक्षात् रूप में, समीपस्थ षिष्यों द्वारा विनयपूर्वक अधिगत किया जाता है तब उपनिषद् संज्ञा से अभिहित होता है। उपनिषद् ग्रंथों में दर्षन के गहनतम तथ्य संनिविष्ट हैं, जिनका अध्ययन-समीक्षण आज भी विद्वानों के लिए अतीव रूचिकर सिद्ध हो रहा है। प्रमुख एवं प्राचीन त्रयोदष उपनिषदों में ‘ईषावास्योपनिषद्’ सभी उपनिषदों का आधार है। यह शुक्ल यजुर्वेदी वाजसनेयी संहिता का चालीसवाँ अध्याय है। इसके प्रथम मन्त्र का प्रारम्भ ‘ईषावास्यम्’ से होने के कारण इसे ‘ईषावास्योपनिषद्’ कहा जाता है। यह उपनिषद् अति लघुकाय है, किन्तु तत्त्वज्ञान और अर्थगाम्भीर्य की दृष्टि से अन्यों से श्रेष्ठ है। इस उपनिषद् के अट्ठारह मन्त्रों का गहन अध्ययन करने पर इसमें मनुष्य के जीवन को सुखमय बनाने के साथ-साथ उसे तत्त्वज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है? इसका वर्णन मिलता है।
How to Cite
डाॅ. राजनाथ यादव. (1). ईशावास्योपनिषद में सामाजिक चेतना. ACCENT JOURNAL OF ECONOMICS ECOLOGY & ENGINEERING ISSN: 2456-1037 INTERNATIONAL JOURNAL IF:7.98, ELJIF: 6.194(10/2018), Peer Reviewed and Refereed Journal, UGC APPROVED NO. 48767, 5(9). Retrieved from http://ajeee.co.in/index.php/ajeee/article/view/992