स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्याभास एवं मूल्यहीनता

  • कुलदीप माधव महाविद्यालय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश।

Abstract

हमारा देश 15 अगस्त सन् 1947 ई. में स्वतंत्र हो गया, लेकिन खण्डित होकर हुआ। शुरु में सरकार के पास शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या थी। एवं उनके रहन सहन एवं समस्या से गुजरना पड़ा। भारत-विभाजन के पूर्व और पश्चात भीषण साम्प्रदायिक दंगे हुए। लाखों लोग बेघर बार हो गये। भारत से पाकिस्तान गये और पाकिस्तान से भारत आये। भारत की जो अखण्ड मूर्ति थी वह खण्डित हो गयी। हिन्दू एवं मुसलमान जो भाई-भाई कहलाते थे वे एक दूसरे के खून के प्यासे हो गये। हिन्दी साहित्य को विभाजन का आभास पूर्व से ही हुआ। इसलिए विभाजन की ऐतिहासिक त्रासदी ने हिन्दी साहित्य को बहुत अधिक प्रभावित नहीं किया। जो साहित्य रचा गया वह उन्हीं के द्वारा है, जो पंजाब के हैं या पाकिस्तान से भारत आये हैं। भारत ने मिश्र अर्थव्यवस्था को अपनाया, जिसमें समाज का कल्याण सर्वोपरि था। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत ने निर्गुटता की स्थिति अपनायी। स्वाधीन भारत की मानसिकता निर्माण में दो प्रक्रियाओं का सर्वाधिक महत्त्व है। एक आम चुनाव का तथा दूसरा पंचवर्षीय योजनाओं का। इन्होंने ही इन स्थितियों में परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ की, और उन परिस्थितयों को सामने रखा, जिन पर स्वाधीनता के उपरांत का साहित्य, जिसे स्वातंत्र्योत्तर साहित्य कहा जाता है, पर आधारित है।
How to Cite
कुलदीप. (1). स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्याभास एवं मूल्यहीनता. ACCENT JOURNAL OF ECONOMICS ECOLOGY & ENGINEERING ISSN: 2456-1037 INTERNATIONAL JOURNAL IF:7.98, ELJIF: 6.194(10/2018), Peer Reviewed and Refereed Journal, UGC APPROVED NO. 48767, 5(9). Retrieved from http://ajeee.co.in/index.php/ajeee/article/view/26