गोंड जन-जाति एवम् भारिया जन-जाति में गोदना का स्वरूप एवं विष्वास का महत्व

  • शान्तनु पाठक

Abstract

भिन्न-भिन्न प्रकार की आकृतियाॅं एवं रचना प्रक्रिया की अपनी मान्यताएंॅ जनजातियों में परम्परागत ढ़ग से गोदना के विषय में आज भी विद्यमान है। जैसे अर्धचंद्र के बीच में एक बिंदु विवाहित सुख का प्रतीक चिन्ह है, भौंहो के बीच में एक लाइन के स्थान पर राख ‘विभूति‘ कहलाता है, जो बुरी नजर से बचाने हेतु प्रतिनिधित्व करती है, इत्यादि। कमल मोर मछली त्रिकोना और स्वास्तिक यह भाग्य चिन्ह कहलाते हैं। तथापि संपूर्ण भारतवर्ष में एक सामान्य विश्वास है कि गोदना-चिन्ह एक सामान्य पुरुष स्त्री के साथ (आत्मा के साथ) ईश्वर शरीर के अन्दर स्वर्ग पहुंचते हैं। अर्थात एसी कोई चीज है जो मृत्यु के बाद अस्तित्व में रहती है, तो वो गोदना चिन्ह है, क्योंकि आत्मा की पहचान उसी से है। मध्यप्रदेश में बैगा महिलाओं के स्वयं के लिए,उनके गोदने, वासना व्यक्त करने का प्रतीक होते हैं और एक (शक्तीशाली) प्रभावी वासना उत्तेजक होते हैं। भुमिया स्त्री छाती या कंधों पर माया जाल (इन्द्र-जाल) गोदना गुदवाती हैं यह मानकर कि यह दुष्ट जादू असफल करेगा। इस तरह कपाल, पृष्ठ, वक्ष, बांह, इत्यादि के संदर्भ में अलग-अलग जनजाति के विशेष मान्यताएं हैं।
How to Cite
शान्तनु पाठक. (1). गोंड जन-जाति एवम् भारिया जन-जाति में गोदना का स्वरूप एवं विष्वास का महत्व. ACCENT JOURNAL OF ECONOMICS ECOLOGY & ENGINEERING ISSN: 2456-1037 INTERNATIONAL JOURNAL IF:7.98, ELJIF: 6.194(10/2018), Peer Reviewed and Refereed Journal, UGC APPROVED NO. 48767, 5(10), 20-31. Retrieved from http://ajeee.co.in/index.php/ajeee/article/view/1369
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